गुलशन कुमार – जिन्होने कानून की खामियों का फायदा उठाया !

 

बॉलीवुड म्युज़िक इंडस्ट्री के बारे में सोचने में सबसे पहले जो नाम सामने आता है, वह है टी- सीरीज़। जी हां, टी- सीरीज ने बॉलीवुड म्युज़िक इंडस्ट्री न सिर्फ बदल कर रख दिया बल्कि उस मुकाम तक पहुंचाया, जहां शायद ही इसे कोई ओर पहुंचा सकता था, और इस सबके पीछे एक ही आदमी की कड़ी मेहनत और म्युजिक के प्रति उनका अथाह प्रेम था। वह शख्य कोई और नहीं बल्कि  कैसेट किंग कहे जाने वाले गुलशन कुमार थे। आज हम इसी शख्सियत के बारे में जानेंगे और उनसे जुड़ी ऐसी बातें जानेंगे जिसके बारे कई लोगों को आज भी कंफ्युज़न है।

गोल चक्के वाली रिकार्ड से कैसेट का युग

80 के गाने आज भी लोगों की ज़ुबान पर रहते हैं, जिन्हे कोई भी भुला नहीं पाया, जिसका कारण था कैसेट युग । इस कैसेट युग की शुरुआत की थी गुलशन कुमार ने । इसलिए उन्हे कैसेट किंग कहा जाता है। 1978 में आई डॉन फिल्म ने हिंदुस्तान को बेहतरीन गानों के अलावा एक और ज़रूरी चीज़ हिंदी सिनेमा को दी और वह था कैसेट रिवोल्यूशन । डॉन हिंदी सिनेमा की ऐसी शुरुआती फिल्मों में से थी जिसके ऑडियो कैसेट बड़ी संख्या में बिके। इससे पहले गोल चक्के वाले रिकार्ड बिका करते थे, जो उस ज़माने में काफी महंगे हुआ करते थे और आम आदमी से काफी दूर थे। इस बदलाव ने म्युज़िक इंडस्ट्री और हिंदी सिनेमा को बदल कर रख दिया। म्यूज़िक इंडस्ट्री का रिकॉर्ड से कैसेट पर शिफ्ट होना सिर्फ टेक्नॉल्जी के स्तर पर बदलाव नहीं था। कैसेट में घर में ही गाने रिकॉर्ड करने और उन्हें इरेज कर के फिर से गाने भरने की सुविधा थी। गुलशन कुमार ने इसका फायदा उठाया और लोगों को कैसेट मुहैया कराई । 5 मई 1956 को जन्मे राजधानी दिल्ली के दरियागंज में जन्में गुलशन कुमार दुआ ने खुद भी कभी नहीं सोचा होगा कि वह एक दिन संगीत की दुनिया के बेताज़ बादशाह बन जाएंगे। दरियागंज के इस पंजाबी लड़के ने  हिंदुस्तान की म्यूजिक इंडस्ट्री का सबसे बड़ा नाम बना ।

पायरेटेड कैसेट बनाकर बेचते थे गुलशन कुमार

दिल्ली के दरियागंज के इस पंजाबी लड़के गुलशन कुमार दुआ के पिता जी एक जूस की दुकान थी। जिसके बाद धीरे-धीरे उन्होने एक स्टोर खोला और बाकी सामानों का साथ कैसेट टेप रिकार्ड बेचना शुरु किया और यहीं से गुलशन कुमार को कैसेट बनाने का दिमाग आया। उन्होने  कॉपीराईट एक्ट के लूप होल्स का फायदा उठाया और ओरिज़िनल गानों की कॉपी बनाकर खूब बेची । गुलशन कुमार ने कैसेट की  खासियत को भुनाते हुए एक नया काम शुरू किया। गुलशन ने अलग-अलग कम्पनियों के एल्बम्स से गानों को मिलाया और एक कैसेट में अमिताभ हिट्स, राजेश खन्ना स्पेशल जैसे नामों के साथ बेचना शुरू किया।

पूर्वी एशिया के देशों से आने वाली ब्लैंक कैसेट में गाने भर के बेचने की लागत तमाम स्थापित कम्पनियों के मुकाबले बहुत कम होती थी। ऊपर से टैक्स न देने के कारण रीटेल कीमत और कम हो जाती थी। रैपर पर कम्पनी का नाम पता नहीं होता था सिर्फ जय माता दी लिख दिया जाता था, जय माता दी लिखे रहने का एक बड़ा फायदा था कि न बिकने वाले एल्बम को सुपर कैसेट (टी सिरीज़) वापस ले लेता था और री-रिकॉर्ड कर के नए एल्बम में चला देता था।

 

उस समय के कॉपीराइट  एक्ट के लूप होल्स को पकड़ा

इस दौर में सुपर कैसेट (टी सिरीज़) ने खूब पैसा कमाया। ग्राहक और दुकानदार जहां बहुत खुश थे। दूसरी  कंपनियों के मालिक कॉपीराइट कानून की खामियों के चलते कुछ नहीं कर पाए। दरअसल उस समय के कानून के मुताबिक किसी को कॉपीराइट उल्लंघन के चलते गिरफ्तार करने के लिए उसे ऑन द स्पॉट पकड़ना ज़रूरी था। मतलब टी-सिरीज़ के मालिक को तभी गिरफ्तार किया जा सकता था जब वो खुद कैसेट कॉपी करते पकड़े जाते।

पहली बार आम आदमी को अपनी पसंद के गाने सुनने का मौका मिला

टी-सीरीज का दूसरा दौर तब आया, जब उस समय के सुपर कैसेट (टी-सीरीज) ने अपने कैसेट के कवर पेज बनाने शुरु कर दिया। रफी की यादें, बेस्ट ऑफ किशोर कुमार  जैसे  नामों से आए इन एल्बम्स में निम्न मध्यमवर्ग तबके में बड़ी पॉपुलैरिटी पाई। इससे पहले फिल्म संगीत को सुनने के दो ही ऑप्शन होते थे। पहला कैसेट और रिकॉर्ड खरीदना और दूसरा बिनाका गीतमाला जैसे रेडियो प्रोग्राम्स में गाने सुनना। पहला तरीका महंगा था और दूसरे में कौन से गाने सुनाए जाए इसको कोई और तय करता था। गुलशन कुमार इस इंडस्ट्री के किंग बनना चाहते थे और किस्मत उनकी मदद कर रही थी।

नए सिंगर्स को ही मौका देते थे गुलशन 

गुलशन कुमार अपने एल्बम के लिए छोटे छोटे शहरों से सस्ते सिंगर्स को लाकर उनसे पुराने गाने गवाते थे और उसमें अपना लेबल लगाकर बेचते थे, क्योंकि उस समय ऐसा कानून नहीं था कि आपको किसी गाने को गाने के लिए राइट लेने पड़े । गुलशन कुमार नए सिंगर्स से पुराने गाने ओरिजिनल आर्केष्ट्रा के साथ बनाते थे इसलिए उन पर उस समय कॉपी राईट का उल्लंघन भी नहीं होता था।गुलशन कुमार ने संगीत की दुनिया को काफी बड़े सिंगर्स और म्युजिक डायरेक्टर दिए । गुलशन कुमार ने इसे भुनाते हुए कुछ ऐसे गायक चुने जिनके नाम तब तक अनजाने थे मगर आवाज़ हिंदी किशोर, रफी और मुकेश का अहसास देती थी. कुमार सानू, बाबला मेहता औऱ सोनू निगम इन सबमें सबसे पॉपुलर हुए। जिनमें सोनू निगम, उदित नारायण, अनुराधा पौडवाल, आनंद मिलिंद, नदीम-श्रवण (इनमें से नदीम वहीं है, जिन पर गुलशन कुमार के मर्डर में मुख्य नाम सामने आया था जिसके बाद वह इंग्लैंड भाग गए और आज तक वापस नहीं आए) ऐसे नाम है जिन्होने काफी नाम कमाया और आज भी कमा रहे है।

गुलशन ने सुपर कैसेट्स इंडस्ट्रीज लिमिटेड कंपनी बनायी जो भारत में सबसे बड़ी संगीत कंपनी बन गई। उन्होंने इसी संगीत कंपनी के तहत ‘टी-सीरीज़’ की स्थापना की। आज ‘टी-सीरीज़’ देश में संगीत और फ़िल्म निर्माण की दिशा में एक बड़ा नाम है। और ‘टी-सीरीज़’ के यूट्यूब चैनल दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चैनल है। 

गुलशन कुमार के साथ नदीम -श्रवणगुलशन कुमार खुद भी काफी धार्मिक प्रवत्ति के व्यक्ति थे सुबह शाम वह मंदिर जाया करते थे । गुलशन कुमार ने देश में गली मोहल्लों में जागरण में गाने वाले भजन गायकों को एक मंच दिया और टी-सीरीज ने जितने भजन के कैसेट बाजार में उतारे उतने आज तक कोई नहीं ला पाया । आपको लखबीर सिंह लख्खा, नरेंद्र चंचल, कुमार विशु तो याद ही होंगे। इनकी आवाज़ पूरे देश में पहुंचाने का काम किया गुलशन कुमार ने। गुलशन कुमार ने अपने धन का एक हिस्सा समाज सेवा के लिए दान करके एक मिसाल कायम की। उन्होंने वैष्णो देवी में एक भंडारे की स्थापना की जो आज भी तीर्थयात्रियों के लिए नि: शुल्क भोजन उपलब्ध कराता है।

गुलशन कुमार की हत्या की कहानी  

गुलशन कुमार का काम करने का  एक ही उसूल था और वह था कि वह सिर्फ नए लोगों को ही मौका देते थे। एक बार कोई भी सिंगर या म्युज़िक डायरेक्टर बड़ा बन गया उसका करियर स्थापित हो गया तो वह फिर उसके साथ काम नहीं करते थे और फिर नए टेलेंट की तलाश में निकल जाते । कुछ ऐसा ही उन्होने नदीम- श्रवण के साथ किया । फिल्म आशिकी में अपना संगीत देने के बाद नदीम- श्रवण  इंडस्ट्री में स्थापित हो गए थे लेकिन उनकी दोस्ती गुलशन कुमार के काफी अच्छी थी । इस बीच नदीम- श्रवण ने एक म्युजिक एल्बम बनाया जिसके कुछ गाने खुद नदीम ने गाए थे, और वह गुलशन कुमार से उनके गाने का प्रमोशन  करवाना चाहते थे । गुलशन कुमार को पता था कि नदीम अच्छे संगीतकार तो हैं लेकिन गाना उनके बस की बात नहीं , फिर भी दोस्ती के कारण उन्होने नदीम के कुछ गाने प्रमोट भी किए , लेकिन नदीम के गाने पिट गए । जिसके बाद गुलशन कुमार ने उनके गाने प्रमोट करने से मना कर दिया। नदीम को लगा की गुलशन, उनका करियर खत्म करना चाहते हैं। इसलिए उन्होने अबु सलेम को फोन कर उन्हे धमकाने की बात कही। अबु सलेम ने इससे पहले ही गुलशन कुमार से एक्सटॉर्शन मनी ली थी । जिसके बाद एक बार फिर अबु सलेम ने गुलशन कुमार को फोन लगाया और फिर से एक्सटॉर्शन मनी मांगी जिसके बाद गुलशन कुमार ने मना कर दिया इसी के साथ अबु सलेम ने उन्हे नदीम के साथ काम करने को कहा। जिस पर गुलशन कुमार ने कहा कि नदीम अगर खुद गाना गाएंगे तो उनके गाने नहीं चल पाएंगे।  एक्सटॉर्शन मनी  न देने और नदीम के साथ काम न करने को लेकर फिर उन्हे सजा मिली और एक दिन मंदिर से पूजा करने के बाद मंदिर के बाहर ही तीन लोगों ने गोलियों से भूनकर उनकी हत्या कर दी ।

गुलशन कुमार के साथ नदीम-श्रवण

गुलशन कुमार की हत्या हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में अंडरवर्ल्ड के कारण हुई आखिरी हत्या थी. कैसेट किंग की मौत ने पूरे देश को हिला दिया. इसके बाद तमाम गिरफ्तारियां हुईं और अंडरवर्ल्ड का दबदबा इंडस्ट्री पर खत्म होने लगा।

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